सोमवार, मार्च 23, 2009


अन्त

जैसे सब थोड़ी-थोड़ी मौत चाहते हैं,
थोड़ी ज़िन्दगी के बाद.
लड़की चाहती है ज़हर,
झूठे प्यार के बाद
नेता चाहता है खौफ़,
भाषण के बाद.
सम्राट चाहता है शांति,
युद्ध के बाद.
न्यूज़ चैनल चाहता है एक कामर्शियल ब्रेक,
बूथ लुटने के बाद,

हर कोई चाहता है कोई न कोई झूठा दिलासा,
एक गहरी शर्म के बाद.
जैसे शब्द चाहते हैं अर्थ कोई,
बार-बार कहे जा चुकने के बाद.

ऐसी निरर्थकता में भी मैं चाहता हूँ एक सार्थक अन्त,
सारी निराशा के बाद.

Jan, 2006

रविवार, फ़रवरी 01, 2009

कविता

मैंने भी कितने बहाने पाल रक्खे थे
फिर भी गाहे-बगाहे जब
वो कहती थी फूल
मैं कह देता गंध.

वो कहती थी स्पर्श
मैं कह देता था देह
वो कहती थी जीवन
मैं कहता था उम्र

उसकी नदी को मैंने कहा पानी
उसने कहा हवा तो मैंने कहा ज़रूरत  

उसने कहा दुनिया तो मैंने कहा चश्मा  

और मुझे छोड़कर चली गई कविता.

: सितम्बर 2008

बुधवार, जनवरी 28, 2009

वक्त की गर्द यूँ तो मैं भी हूँ, तुम भी हो
अर्श के नीचे सफर में, मैं भी हूँ, तुम भी हो. 

दोस्त ही है चाँद अपना हिज्र में भी
चाँद की बिखरी नज़र में, मैं भी हूँ, तुम भी हो.

ख्वाब है जाने का अपना अर्श पर
ख्वाब के तामीर घर में मैं भी हूँ, तुम भी हो.

ढूंढ लेगी सुबह हमको वस्ल की
रात के अन्तिम पहर में मैं भी हूँ, तुम भी हो.

: 2003